धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: दो चिट्ठियां, दस दिन का दबाव, और आखिर में एक कुर्सी खाली
शनिवार, बारह बजे के आसपास। धर्मेंद्र प्रधान के X अकाउंट पर एक पोस्ट आती है। कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं। कोई शोर-शराबा नहीं। बस एक चिट्ठी की फोटो, और नीचे कुछ पंक्तियां। बस इतना ही काफी था यह समझने के लिए कि देश के शिक्षा मंत्री ने पद छोड़ दिया है, त्यागपत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजा जा चुका है।
चार दिन पहले तक जंतर-मंतर खाली नहीं हो रहा था।
CJP, यानी कॉकरोच जनता पार्टी, के झंडों तले हजारों छात्र जमा थे। नारे वही पुराने। मंत्री जी हटो। अब हट गए हैं।
पहली चिट्ठी छोटी है, आधा पन्ना भी नहीं।
शुरुआत ही इस बात से होती है कि प्रजातंत्र की ताकत पर हमेशा भरोसा रहा है उन्हें, और युवाओं के सपनों, आकांक्षाओं का गहरा सम्मान भी। यूथ को उन्होंने सिर्फ भारत का भविष्य नहीं कहा, बल्कि एक नए, विकसित भारत का निर्माता और शिल्पकार बताया। पढ़ते हुए लगता है कि यह सिर्फ इस्तीफे की औपचारिकता भर नहीं है।
पिछले दस दिनों का घटनाक्रम देखकर मन दुखी है,
यह उन्होंने लिखा। व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का मामला यह कभी था ही नहीं। भारत की युवाशक्ति ही असली ताकत है, और उसे भ्रम के जाल में फंसने नहीं दिया जाएगा। जंतर-मंतर पर बनी स्थिति का फायदा कोई राष्ट्र-विरोधी ताकत न उठाए, देश की एकता बनी रहे, किसी विद्यार्थी का भविष्य कानूनी पेचीदगियों में न उलझे, बच्चे पढ़ाई और करियर पर ध्यान दें - इसी सोच के साथ त्यागपत्र भेजने का फैसला लिया गया।
आखिरी हिस्से में प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन और भरोसे का शुक्रिया अदा किया गया है।
मंत्रिपरिषद के साथियों का, मंत्रालय के अधिकारियों-कर्मचारियों का धन्यवाद भी। राष्ट्रसेवा को जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया गया, भगवान जगन्नाथ के आशीर्वाद का जिक्र भी आया। और यह भरोसा भी - भारत माता, ओडिशा की जनता, देश के युवाओं की सेवा आगे भी जारी रहेगी। नीचे दस्तखत: आपका, धर्मेंद्र प्रधान।
दूसरी चिट्ठी कहीं ज्यादा लंबी है,
और तकनीकी भी। पढ़ने में समय लगता है, हर लाइन में कोई न कोई आंकड़ा, कोई तारीख। "मेरे युवा साथियों" से शुरू होती है। चार दशक से ज्यादा लंबे उस सफर की बात, जो छात्र, शिक्षक और शिक्षा सुधारक के तौर पर तय किया गया। एक मजबूत, समावेशी और दूरदर्शी शिक्षा व्यवस्था ही मजबूत राष्ट्र की नींव होती है, यही विश्वास हमेशा रहा है।
अब असली मुद्दे की बात।
3 मई 2026 को हुई NEET-UG परीक्षा में गड़बड़ी सामने आई थी। सरकार ने तुरंत संज्ञान लिया। जांच CBI को सौंपी गई। परीक्षा रद्द हुई, नई तारीख घोषित हुई। और यह भी तय हुआ कि अगले साल से यह परीक्षा कंप्यूटर आधारित यानी CBT मोड में होगी।
बीस लाख से ज्यादा छात्रों की परीक्षा दोबारा शांति से कराना, यह कोई छोटी बात नहीं थी।
केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों की, खासकर जिला प्रशासन की, बड़ी भूमिका रही इसमें। छात्रों, अभिभावकों, मां-बाप के सहयोग से 21 जून 2026 को परीक्षा पूरी हुई। पहले ही दिन से जिम्मेदारी ली गई, मुंह नहीं मोड़ा गया - यह दावा उनका खुद का है। संकल्प यही था कि किसी मेधावी छात्र की संभावना परीक्षा माफिया की वजह से खराब न हो।
16 जुलाई को नतीजे आए। संतोषजनक रहे। गरीब पृष्ठभूमि से आए कई मेधावी छात्रों को भी सफलता मिली। पर एक शिकायत भी दर्ज है इस चिट्ठी में - इसी दौरान कुछ जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों ने छात्रों को गुमराह करने की कोशिश की। इससे मन बेहद व्यथित हुआ।
अब उन दस दिनों पर लौटते हैं, जिनका जिक्र दोनों चिट्ठियों में बार-बार आया है।
21 जुलाई को देशभर में विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए थे। दिल्ली, पटना, चेन्नई, बेंगलुरु - हर बड़े शहर में एक ही मांग गूंज रही थी। बेंगलुरु में "संसद चलो" मार्च के दौरान छात्रों के साथ झड़प तक हो गई। कांग्रेस के कई कार्यकर्ता हिरासत में लिए गए।
संसद के भीतर भी शांति नहीं थी।
राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी मानसून सत्र में लगातार इस मुद्दे पर सरकार को घेरते रहे। प्रधान ने जवाब भी दिया - कांग्रेस पर आरोप लगाया कि छात्रों को सिर्फ राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है।
सोनम वांगचुक का अनिश्चितकालीन अनशन भी इसी बीच सुर्खियों में रहा।
सरकार से भरोसा मिलने पर उन्होंने अनशन खत्म किया। पर CJP का रुख साफ था। जब तक शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं देते, आंदोलन जारी रहेगा। शनिवार को आखिर वही मांग पूरी हो गई।
धर्मेंद्र प्रधान का सियासी सफर भी यहां याद करने लायक है।
ओडिशा से आने वाले प्रधान बीजेपी के उन चेहरों में गिने जाते रहे हैं जिन्हें पेट्रोलियम और शिक्षा जैसे भारी मंत्रालय सौंपे गए। नई शिक्षा नीति यानी NEP 2020 को लागू करवाने में उनकी भूमिका काफी अहम मानी जाती रही है। इसीलिए उनका इस तरह हटना कई राजनीतिक जानकारों को चौंका गया।
दोनों चिट्ठियों का लहजा भी अलग है।
पहली में भावुकता ज्यादा है, दूसरी में तथ्य और सफाई। शायद इसीलिए दोनों को अलग-अलग पोस्ट किया गया - एक विदाई संदेश की तरह, दूसरी एक औपचारिक जवाबदेही की तरह।
अब शिक्षा मंत्रालय की कमान किसके हाथ जाएगी,
यह अभी साफ नहीं। सरकार की तरफ से कोई बयान नहीं आया है। विपक्ष की मांग है कि सिर्फ मंत्री बदलने से बात नहीं बनेगी, NTA का पूरा ढांचा बदलना होगा। छात्र संगठनों में भी राय बंटी है। कुछ इसे जीत मान रहे हैं। कुछ कह रहे हैं, असली लड़ाई अभी बाकी है।
एक बात तय है।
छात्रों के लगातार दबाव में एक केंद्रीय मंत्री को कुर्सी छोड़नी पड़े, ऐसा भारतीय राजनीति में बहुत कम देखने को मिलता है। पिछले कुछ दशकों में गिने-चुने मामले ही याद आते हैं जहां छात्र आंदोलन इतना असरदार साबित हुआ हो। जंतर-मंतर की भीड़ धीरे-धीरे शांत होगी या नहीं, यह अभी कहना मुश्किल है, पर फिलहाल तो CJP के कार्यकर्ता इसे अपनी जीत मानकर जश्न मना रहे हैं।
अगला शिक्षा मंत्री कौन होगा, और क्या NEET को लेकर उठा गुस्सा वाकई थमेगा - इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा।
सोनम वांगचुक भूक हारताल आर्टिकल

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